सुप्रीम कोर्ट (फोटो साभार: etvbharat)
सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा को खत्म करने और उसके स्थान पर कम दर्दनाक तरीका अपनाने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। सर्वोच्च्च अदालत ने फांसी के जरिए मृत्युदंड दिए जाने की वर्तमान कानूनी व्यवस्था को बरकरार रखा। हालांकि कोर्ट ने सुधार की गुंजाइश बनाए रखी।
समाचार एजेंसी पीटीआई की एक्स पोस्ट के अनुसार, मंगलवार (18 अगस्त 2026) को फांसी देकर मौत की सजा देने के संवैधानिक आधार को सही ठहराते हुए जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने स्पष्ट किया, कि फिलहाल देश में सजा-ए-मौत के लिए फांसी का तरीका ही जारी रहेगा।
STORY | SC dismisses plea seeking abolition of execution by hanging
The Supreme Court on Tuesday dismissed a petition seeking the abolition of the present practice of executing a death row convict by hanging and replacing it with less painful methods such as intravenous lethal… pic.twitter.com/LbfmdijHeJ
— Press Trust of India (@PTI_News) August 18, 2026
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, कि केंद्र सरकार चाहे तो विशेषज्ञों की मदद से अन्य माध्यमों की जांच कर सकती है। जिसमें कानून, फोरेंसिक मेडिसिन, न्यूरोसाइंस और क्रिमिनोलॉजी जैसे क्षेत्रों की मदद ली जाए। ताकि यह पता लगाया जा सके, कि क्या सजा-ए-मौत का कोई दूसरा तरीका अनावश्यक दर्द को बेहतर ढंग से कम कर सकता है।
दरअसल, वकील ऋषि मल्होत्रा द्वारा दायर याचिका में फांसी के बजाय दूसरे तरीकों, जैसे जहरीला इंजेक्शन, गोली मारना, बिजली का झटका देना या गैस चैंबर का सुझाव दिया गया। इनसे दोषी की मौत कुछ ही मिनटों में हो सकती है। उन्होंने फांसी को मौत की सजा देने का एक क्रूर और अमानवीय तरीका बताया।
याचिकाकर्ता ने कहा, कि दुनिया भर के कई देशों ने फांसी देने का तरीका पहले ही छोड़ दिया है। याचिकाकर्ता ने इस मुद्दे से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के पहले के तीन फैसलों को बड़ी पीठ के पास भेजने की मांग भी की थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर पहले के तीन फैसलों को बड़ी बेंच के पास भेजने की याचिका भी खारिज कर दी।
बेंच ने कहा, कि ऐसा करने के लिए कोई ठोस आधार नहीं है। पीठ ने पुराने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 354 और वर्तमान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 393 के संदर्भ में भी याचिका पर विचार किया। वहीं सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर नाराजगी जताई थी, कि केंद्र सरकार इस प्रथा को बदलने के लिए तैयार नहीं थी।
गौरतलब है, कि पुराने सीआरपीसी की धारा 354(5) में मौत की सजा पाए शख्स को गर्दन से तब तक लटकाने का प्रावधान था, जब तक उसकी मौत न हो जाए। अब नए BNSS में इसका प्रावधान धारा 393(5) में है। सुप्रीम कोर्ट पहले भी 1983 के “दीना” मामले में फांसी की संवैधानिक वैधता बरकरार रख चुका है।
बता दें, कि वर्ष 2003 में विधि आयोग की 187वीं रिपोर्ट ने फांसी के साथ घातक इंजेक्शन को वैकल्पिक तरीका बनाने की सिफारिश की थी। आयोग ने विज्ञान और मेडिकल तकनीक में बदलाव को देखते हुए इस मुद्दे पर विचार किया था।
