CM धामी ने उत्तराखंड राज्य आंदोलन के बलिदानियों को किया नमन
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शुक्रवार 2 अक्टूबर को शहीद स्थल कचहरी परिसर, देहरादून में उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी शहीदों की पुण्य स्मृति में उनके चित्रों पर पुष्पांजलि अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा, कि आपका त्याग, संघर्ष और बलिदान उत्तराखंड की पहचान और राज्य निर्माण की गौरवशाली यात्रा का अमिट अध्याय है।
सीएम धामी ने उत्तराखण्ड राज्य निर्माण के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने वाले राज्य आंदोलनकारियों को नमन करते हुए कहा, कि उनके संघर्ष, त्याग और बलिदान से ही अलग उत्तराखंड राज्य का निर्माण संभव हो सका। उन्होंने कहा, कि राज्य सरकार आंदोलनकारियों एवं शहीद आंदोलनकारियों के परिजनों के सम्मान और कल्याण के लिए प्रतिबद्ध है।
रामपुर गोलीकांड की बरसी पर कचहरी, देहरादून स्थित शहीद स्थल पर राज्य निर्माण आंदोलन में सर्वोच्च बलिदान देने वाले राज्य आंदोलनकारियों को पुष्प चक्र अर्पित कर भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी।
राज्य आंदोलनकारियों के अदम्य संघर्ष, त्याग और बलिदान के परिणामस्वरूप ही पृथक उत्तराखण्ड राज्य का… pic.twitter.com/gQynLFi2Ls
— Pushkar Singh Dhami (@pushkardhami) October 2, 2026
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा, कि राज्य आंदोलनकारियों के सपनों के अनुरूप समृद्ध, सशक्त और आत्मनिर्भर उत्तराखण्ड का निर्माण ही शहीद आंदोलनकारियों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। उन्होंने कहा, कि राज्य निर्माण में उनके योगदान और बलिदान को सदैव श्रद्धा एवं कृतज्ञता के साथ स्मरण किया जाता रहेगा।
उल्लेखनीय है, कि उत्तराखंड के आंदोलनकारियों को अलग राज्य तो मिल गया है, लेकिन 32 साल पहले घटित रामपुर तिराहा कांड को आज भी आंदोलनकारी भूले नहीं है। अक्टूबर 1994 तक राज्य के गठन को लेकर आंदोलन संघर्ष मंच समिति अपना आकार ले चुका था, इसी मंच के आह्वान पर दो अक्तूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करना निर्धारित किया गया था।
आंदोलन की भावना के अनुरूप गढ़वाल और कुमाऊं मंडल से सैकड़ों बसों का काफिला 1 अक्तूबर की रात के दिल्ली के लिए निकला था। वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारीयों के अनुसार, किसी को भी इस बात का जरा भी आभास नहीं था, कि कुछ ही क्षणों में हमारा सामना खौफनाक मंजर से होगा।
रामपुर तिराहा गोलीकांड में उत्तराखंड के राज्य आंदोलनकारियों पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं गईं थी, और इस गोलीकांड में कई आंदोलनकारियों की मौत भी हुई थी। रामपुर तिराहा गोलीकांड ने गुलाम भारत के इतिहास में घटित जलियांवाला बाग हत्याकांड की यादें ताजा कर दी थी।
राज्य आंदोलनकारियों के अनुसार, रामपुर तिराहा पहुंचते ही गोलियों की आवाज आई, हमारी आँखों के सामने लाशें गिरी हुई थी, खून से लथपथ लोग, जलती गाड़ियां देखकर हमारी आंखों से बस आंसू बह रहे थे। थोड़ी देर बाद महिलाओं के साथ बदसलूकी की खबरें भी मिली। ये सब सुनकर और देखकर प्रत्येक उत्तराखंडी का दिल बैठ सा गया।
पुलिस की लाठचार्ज के बाद कई आंदोलनकारियों को गंभीर चोटें भी आईं थी। एक जनांदोलन के रूप में यह वह दौर था, जब कोदा-झंगोरा खाएंगे, उत्तराखंड बनाएंगे के नारे हवा में तैरा करते थे। हर कोई किसी ना किसी रूप में राज्य आंदोलन से जुड़ा हुआ था।
दो अक्तूबर की सुबह तक 1994 में राज्य आंदोलनकारियों को मिले जख्म 32 साल के बाद भी आज तक भर नहीं पाए है। 1 अक्तूबर की वह काली रात दमन, बलप्रयोग और अमानवीयता की सीमाओं को पार करने वाली साबित हुई। आज भी आंदोलनकारी उस भयावह रात को याद कर सिहर उठते है।
बता दें, कि रामपुर तिराहा गोलीकांड में उत्तर प्रदेश पुलिस और पीएसी के जवान आरोपित है। अभी भी गोलीकांड से जुड़े दो मुकदमे न्यायालय में लंबित है।
