सांकेतिक चित्र (फोटो साभार: Gemini Canvas /canva) AI
केरल के कोल्लम इलाके से एक हृदयविदारक घटना सामने आई। यहां एक 90 वर्षीय बुजुर्ग महिला की लाश को उसके मानसिक रूप से बीमार बेटे ने तीन दिन तक घर के अंदर रखा और रोजाना उस लाश के पुनः जीवित होने की आशा में पूजा-पाठ करता रहा।
यह मामला बीते शुक्रवार शाम को तब सामने आया, जब मृतका की पोती घर पहुंची और कमरे के भीतर का नजारा देखकर हतप्रभ रह गई। स्थानीय पुलिस जब मौके पर पहुंची तो, देखा कि शव सड़ना शुरू हो गया था। शव के आसपास अगरबत्ती की राख और पूजा-पाठ की सामग्री भी मिली है।
जानकारी के मुताबिक, यह घटना कोल्लम के कुलाथुपुझा में रबर प्लांटेशन एस्टेट स्थित आरपीएल टूएफ क्वार्टर्स में सामने आई है। मृतका की पहचान चिन्नाथम्मा के रूप में हुई है। चिन्नाथम्मा का पिछले बुधवार को वृद्धावस्था से संबंधित बीमारियों के कारण निधन हो गया था।
बताया जा रहा है, कि यह मामला शुक्रवार शाम तक सामने नहीं आया, लेकिन जब घर के आसपास रहने वाले लोगों को दुर्गंध महसूस हुई, तो उन्होंने मृतका की पोती को इस संबंध में सूचित किया। 55 वर्षीय कृष्णास्वामी जो मानसिक रूप से दिव्यांग हैं, अपनी बीमार मां की देखभाल करने वाला परिवार का एकमात्र सदस्य था।
सूचना मिलने पर मौके पर पहुंची पुलिस ने अप्राकृतिक मौत का मामला दर्ज कर लिया है। शव को पोस्टमॉर्टम के लिए पारिपल्ली गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल ले जाया गया। साथ ही मृतका के बेटे को भी हिरासत में लिया गया है और जरूरी साइकेट्रिक जांच और उपचार के लिए उसे मेंटल हेल्थकेयर केंद्र में भर्ती किया जाएगा।
कृष्णास्वामी ने पुलिस को बताया, कि वह रोजाना गीले कपड़े से माँ के मृत शरीर को पोंछता था और बदबू रोकने के लिए पाउडर लगाता था। वह लाश को भस्म और चंदन का लेप भी लगाता था, उसे उम्मीद थी, कि उसकी माँ एक दिन जिंदा हो जाएगी।
स्थानीय मीडिया के मुताबिक, जब कृष्णास्वामी की बेटी शुक्रवार शाम को घर पहुंची, तो घर के अंदर जाने पर शव सफेद कपड़े में लिपटा हुआ नजर आया और कृष्णास्वामी ने बेटी को देखकर कहा, ‘दादी मर गई हैं।’ इसके बाद मृतका की पोती ने तुरंत नजदीकी रिश्तेदारों और स्थानीय पुलिस को घटना के संबंध में सूचित किया।
अपनी माँ की मृत्यु की सच्चाई को स्वीकार नहीं कर पाने की स्थिति में कृष्णास्वामी ने इस बात को लोगों से छुपाने का फैसला किया। बताया जा जा रहा है, कि कृष्णास्वामी आम तौर पर किसी से अधिक बात नहीं करता था।
माँ की मृत्यु से पहले जब आशा वर्कर या स्वास्थ्य सेवा कर्मचारी आते थे, तो वह उन्हें यह कहकर लौटा देता था, कि ‘मैं अपनी मां का ख्याल खुद रख लूंगा’ और उन्हें अंदर नहीं आने देता था। शायद इस वजह से भी किसी को इस घटना के बारे में पता नहीं चल पाया। यह घटना समाज और आस-पड़ोस में रहने वाले लोगों के बीच बढ़ते अंतर को रेखाकिंत करती है।
