पतंजलि योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण
बाबा रामदेव के सहयोगी और पतंजलि योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण से जुड़े फर्जी दस्तावेज और पासपोर्ट मामले में आज देहरादून की सीबीआई अदालत ने फैसला सुनाया। कोर्ट ने बालकृष्ण को बरी कर दिया है। मामला फर्जी शैक्षणिक प्रमाण पत्रों के आधार पर भारतीय पासपोर्ट हासिल करने के आरोपों से जुड़ा है।
जानकारी के अनुसार, तृतीय अपर मुख्य न्याययिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने केस पर फैसला सुनाया है। मामले की शुरुआत अप्रैल 2011 में मिली शिकायत से हुई थी। आरोप था, कि भारतीय पासपोर्ट हासिल करने के लिए बरेली स्थित पासपोर्ट कार्यालय में कुछ शैक्षणिक प्रमाणपत्र पेश किए गए थे, जिनकी प्रमाणिकता पर सवाल उठे थे।
इसके बाद सीबीआई ने प्रारंभिक जांच के बाद जुलाई 2011 में एफआईआर दर्ज की थी। मामले में आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेज तैयार करने और उनका इस्तेमाल करने के साथ पासपोर्ट एक्ट की धाराएं लगाई गई थी। जांच में बुलंदशहर के खुर्जा स्थित राधाकृष्ण संस्कृत महाविद्यालय से जुड़े प्रमाणपत्र भी सामने आए थे।
सीबीआई ने विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड के आधार पर इन प्रमाणपत्रों की वैधता पर सवाल उठाए थे। जुलाई 2011 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने आचार्य बालकृष्ण की गिरफ्तारी पर अंतरिम लोग लगाई थी। जांच पूरी होने के बाद सीबीआई ने साल 2012 में अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया था।
इस मामले की सुनवाई में लंबे समय तक आचार्य बालकृष्ण का पासपोर्ट अदालत में जमा रहा था। वर्ष 2018 में हाईकोर्ट ने उन्हें पासपोर्ट वापस लेने और नवीनीकरण कराने की अनुमति दी थी। आचार्य बालकृष्ण का ये केस करीब 15 साल तक चला है। करीब डेढ़ दशक पुराने इस मामले में आज कोर्ट ने फैसला सुनाया है।
यह मामला उस वक्त खासा चर्चाओं में रहा। सीबीआई ने इस मामले में वर्ष 2016 में नेपाल सरकार के साथ पत्राचार किया था। इसके साथ ही शिक्षण संस्थान के पूर्व प्रिंसिपल नरेश चंद द्विवेदी के खिलाफ भी धोखाधड़ी और जालसाजी का आरोपपत्र दाखिल किया गया था।