बागी TMC सांसदों ने NCPI में किया विलय (फोटो साभार: ANI)
ममता बनर्जी की पार्टी में सियासी भूचाल आ गया है। दरअसल, तृणमूल कांग्रेस में फूट के बाद 20 सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) का दामन थाम लिया है। यह संख्या लोकसभा में TMC के कुल सांसदों के दो-तिहाई से अधिक है, जिस कारण यह गुट दल-बदल कानून के तहत अयोग्यता से बचने की कानूनी सुरक्षा प्राप्त कर सकता है।
बता दें, कि नेशनलिस्ट सिटीजन पार्टी ऑफ इंडिया त्रिपुरा की एक छोटी राजनीतिक पार्टी है। इस सियासी हलचल ने बंगाल के साथ-साथ पूरे पूर्वोत्तर की राजनीति में भूचाल ला दिया है। नेशनलिस्ट सिटीजन पार्टी की मुख्य रूप से मौजूदगी असम, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल और उत्तर-पूर्व के अन्य राज्यों में मानी जाती है। इसका वोटर बेस बंगाली समुदाय ही माना जा रहा है।
बताया जा रहा है, कि NCPI भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली NDA सरकार को अपना समर्थन देगी। टीएमसी सांसदों के इसमें विलय के बाद इस पार्टी को राज्य में काफी मजबूती मिलेगी। इस संभावित विलय के बाद पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी को संसदीय और सांगठनिक स्तर पर एक और बड़ा झटका लगना तय माना जा रहा है।
बागी नेताओं में सुदीप बंद्योपाध्याय, काकोली घोष दस्तिदार, सताब्दी रॉय, सायोनी घोष और अरूप चक्रवर्ती जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र सौंपकर स्वयं को एनसीपीआई के सदस्य के तौर पर मान्यता देने और संसद में अलग बैठने की व्यवस्था की माँग की है। साथ ही, इस गुट ने एनडीए का समर्थन करने का भी ऐलान किया है।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है, कि जिस NCPI में विलय किया गया है, वह देश की एक बेहद छोटी और लगभग अज्ञात राजनीतिक पार्टी है। 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में इसके सिर्फ दो उम्मीदवार मैदान में उतरे थे। दोनों को बहुत कम वोट मिले। पूरी पार्टी को कुल मिलाकर सिर्फ 822 वोट मिले थे।
उल्लेखनीय है, कि भले ही टीएमसी के बागी सांसदों ने एनसीपीआई में अपना विलय कर दिया है, लेकिन उन्होंने अभी भी असली टीएमसी पर अपना दावा नहीं छोड़ा है। बागी सांसदों का कहना है, कि अदालत तय करेगी, कि असली तृणमूल कांग्रेस पार्टी कौन सी है। उन्होंने फिलहाल नेशनलिस्ट सिटीजन पार्टी में अपना विलय करने का रास्ता अपनाया है।
वहीं TMC नेताओं में असंतोष की खबरें केवल संसद तक सीमित नहीं हैं, बल्कि 60 से अधिक विधायक पार्टी नेतृत्व के कुछ फैसलों से नाराज हैं। यदि भविष्य में इनमें से बड़ी संख्या में विधायक भी एनसीपीआई में शामिल हो जाते हैं, तो पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव आ सकता है और एनडीए को एक मजबूत सहयोगी मिल सकता है।
