UGC विवाद पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का बयान,(फोटो साभार X@TheKalchakra/ANI)
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों को लेकर जारी विरोध के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस मामले में पहला बयान सामने आया है। इस पूरे मामले को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने मंगलवार को भरोसा दिलाया, कि किसी भी जाति के छात्रों के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा।
UGC के नए रेगुलेशन पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा, कि मैं विनम्रता से सभी को आश्वस्त करना चाहता हूं, कि किसी का उत्पीड़न या कोई भेदभाव नहीं होगा और कोई भी कानून का गलत इस्तेमाल नहीं कर पाएगा। उन्होंने कहा, कि भेदभाव के नाम पर किसी को कानून का दुरुपयोग करने का अधिकार नहीं रहेगा। यूजीसी हो, केंद्र हो या राज्य सरकार हो यह उनका दायित्व होगा।
#WATCH | On new regulation of UGC, Union Education Minister Dharmendra Pradhan says,” I assure everyone there will be no discrimination and no one can misuse the law.” pic.twitter.com/0ZRgWaU76H
— ANI (@ANI) January 27, 2026
बता दें, कि UGC की ओर से ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम 2026’ लाया गया है। इसके खिलाफ देश के अलग-अलग हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। दरअसल, यूजीसी के नए रेगुलेशन का उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में एससी, एसटी, ओबीसी, ईडब्लूएस, महिलाओं, दिव्यांगों, शिक्षकों और कर्मचारियों के साथ होने वाले भेदभाव को समाप्त करना है।
(UGC) के नए नियमों के तहत प्रत्येक शिक्षण संस्थान में समानता कमेटी के गठन का प्रावधान किया गया है। इस कमेटी में नौ सदस्य होंगे, जिनमें से पांच सीटें आरक्षित होंगी। इस कमेटी में सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व की अनिवार्यता का जिक्र नहीं है। जनरल कैटेगरी के छात्रों का कहना है, कि उनके खिलाफ झूठी और दुर्भावनापूर्ण शिकायतें की जा सकती है।
इसके अलावा विवाद का दूसरा कारण है, जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा। दरअसल, इसमें एससी, एसटी और ओबीसी को शामिल किया गया है, वहीं सामान्य वर्ग का कोई जिक्र नहीं है। अगर जनरल कैटेगरी के छात्रों के साथ भेदभाव होता है, तो उनकी सुनवाई कौन करेगा। नए नियमो के अनुसार शिकायत सिर्फ एससी, एसटी और ओबीसी छात्र ही कर सकते है।
इसके साथ ही झूठी शिकायतों को रोकने के लिए ठोस प्रावधान नहीं किए गए है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की गई है। याचिका में इन विनियमों की इन आधार पर आलोचना की गई है, कि जाति आधारित भेदभाव को सख्ती से अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) के सदस्यों के खिलाफ भेदभाव के रूप में परिभाषित किया गया है।

