सांकेतिक चित्र
ऋषिकेश स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में दंपति ने मानवता की अद्भुत मिसाल पेश की है। दरअसल, मात्र 8 दिन की एक नवजात बच्ची की मृत्यु के बाद शोक में डूबे माता-पिता ने अडिग संकल्प के साथ उसका शरीर चिकित्सा शिक्षा के लिए दान कर दिया।
रिपोर्ट्स के अनुसार, नेत्रदान कार्यकर्ता व लायंस क्लब ऋषिकेश देवभूमि के चार्टर अध्यक्ष गोपाल नारंग ने बताया, कि दो जनवरी को चमोली निवासी संदीप राम की पत्नी हंसी ने श्रीनगर में एक नवजात शिशु को जन्म दिया। जन्म के बाद शिशु में जन्मजात महावृहदान्त्र (हिर्शस्प्रुंग रोग) पाया गया, जिसमें आंतों में तंत्रिका गुच्छों (गैंग्लिया) का अभाव था।
उन्होंने बताया, कि भारत में यह रोग अपेक्षाकृत दुर्लभ होने के कारण नवजात को श्रीनगर से एम्स ऋषिकेश रेफर किया गया। एम्स ऋषिकेश में नवजात का आपरेशन कर उसकी जान बचाई गई, किंतु आपरेशन के तीन दिन बाद बीते रविवार को नवजात की रिफ्रैक्टरी सेप्टिक शाक के कारण शिशु की मृत्यु हो गई।
अंतिम संस्कार की प्रक्रिया को लेकर स्वजनों ने एम्स ऋषिकेश के सीनियर नर्सिंग आफिसर मोहित व महिपाल से जानकारी प्राप्त की। उन्होंने पीड़ित दंपती की मदद के लिए मोहन फाउंडेशन उत्तराखंड के प्रोजेक्ट लीडर संचित अरोड़ा को सूचित किया। संचित अरोड़ा ने दंपती को देहदान का महत्व समझाया और मानव कल्याण में योगदान देने को प्रेरित किया।
उन्होंने कहा, कि यदि वह मृत नवजात का देहदान करेंगे तो चिकित्सा शोध में कई कल्याणकारी कार्य हो सकेंगे। इसके बाद दंपती ने मृत नवजात के देहदान की सहमति दी। इसके बाद उन्होंने एम्स ऋषिकेश के एनाटामी विभाग के अध्यक्ष डा. मुकेश सिंगला व प्रोफेसर डा. रश्मि मल्होत्रा से संपर्क किया।
विभागाध्यक्ष के निर्देशन में तकनीकी सहायक द्वारा आवश्यक कागजी कार्यवाही पूर्ण कर नवजात की देह विभाग को सौंपा गया। इस दौरान डा.राजू बोकन, अजय रावत, ऋषभ, विजय, अरुण शर्मा, स्नेह कुमारी, रूपेंद्र व नेहा सकलानी ने नवजात की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की और पीड़ित दंपती द्वारा मानव कल्याण में दिए योगदान की सराहना की गई।
वहीं नवजात के पिता संदीप राम ने बताया, कि हमारे बच्चे को जन्म से ही आंतों की गंभीर बीमारी थी। तमाम प्रयासों के बावजूद हम उसे बचा नहीं पाए। यह हमारे जीवन का सबसे बड़ा दुख है। जब हमें देहदान के बारे में बताया गया, तो हमने यही सोचा, कि भले ही हमारा बच्चा इस दुनिया में न रह सका, लेकिन उसका शरीर किसी और बच्चे के जीवन की उम्मीद बन सकता है।
